Super El Niño: प्रशांत महासागर में बढ़ रही गर्मी, क्या सुपर अल नीनो बदल देगा भारत के मानसून का गणित?

By: Mohini Sharma | Edited By: Mohini Sharma
Jun 5, 2026, 10:30 AM
WhatsApp icon
thumbnail image

सुपर अल-नीनो का खतरा, सांकेतिक फोटो: AI-Generated

मुख्य मौसम बिंदु

  • सुपर अल-नीनो बनने की संभावना 95% से अधिक।
  • मानसून सीजन के दौरान अल-नीनो के सक्रिय रहने के संकेत।
  • मानसून की शुरुआत और प्रगति सामान्य से धीमी हो सकती है।
  • हर अल-नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ता, लेकिन मानसून प्रभावित हो सकता है।

दुनियाभर में इस समय "सुपर अल नीनो" चर्चा का विषय बना हुआ है। मौसम वैज्ञानिकों से लेकर मीडिया तक, हर जगह इस शब्द का उल्लेख हो रहा है। लेकिन क्या वास्तव में सुपर अल नीनो भारत के मानसून को प्रभावित कर सकता है? क्या इस वर्ष मानसून कमजोर पड़ सकता है? और क्या देश में सूखे जैसी स्थिति बनने का खतरा है? आइए समझते हैं कि सुपर अल नीनो क्या है और भारत के लिए इसके क्या मायने हो सकते हैं।

सुपर अल नीनो क्या है? क्या यह कोई वैज्ञानिक शब्द है?

सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि "सुपर अल नीनो" कोई आधिकारिक वैज्ञानिक शब्द नहीं है। मौसम विज्ञान के साहित्य में इसका औपचारिक उपयोग नहीं होता। वैज्ञानिक इसे "Very Strong El Niño" की श्रेणी में रखते हैं। अल नीनो तब बनता है जब भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर के बड़े हिस्से में समुद्र की सतह का तापमान सामान्य से कम से कम 0.5 डिग्री सेल्सियस अधिक हो जाता है और यह स्थिति लंबे समय तक बनी रहती है। इसी प्रकार जब तापमान सामान्य से 0.5 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक नीचे चला जाता है, तब ला नीना की स्थिति बनती है।

सामान्य से अधिक तापमान के आधार पर अल नीनो को चार श्रेणियों कमजोर (Weak), मध्यम (Moderate), मजबूत (Strong) और बहुत मजबूत (Very Strong) में बांटा जाता है, । आम बोलचाल में बहुत मजबूत अल-नीनो (Very Strong El Niño) को ही "सुपर अल-नीनो (Super El Niño)" कहा जाता है।

भारत के मानसून से अल नीनो का क्या संबंध है?

अल नीनो का केंद्र भले ही प्रशांत महासागर हो, लेकिन इसका प्रभाव दुनिया के कई हिस्सों में दिखाई देता है। भारत का दक्षिण-पश्चिम मानसून भी इससे प्रभावित होता है। ऐतिहासिक आंकड़े बताते हैं कि लगभग 75 से 80 प्रतिशत अल नीनो वर्षों में भारत में सामान्य से कम बारिश दर्ज की गई है। वहीं लगभग 60 प्रतिशत मामलों में सूखे जैसी परिस्थितियां भी बनी हैं। यही वजह है कि मौसम वैज्ञानिक अल नीनो की हर गतिविधि पर करीब से नजर रखते हैं।

हालांकि इसका मतलब यह नहीं है कि हर अल नीनो वर्ष में सूखा ही पड़ेगा। कई बार मजबूत अल नीनो के बावजूद सामान्य मानसून भी दर्ज किया गया है। फिर भी मानसून पर इसके प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

2025 में सुपर अल नीनो बनने की कितनी संभावना है?

दुनिया की प्रमुख मौसम एजेंसियां जैसे अमेरिका की राष्ट्रीय महासागरीय एवं वायुमंडलीय प्रशासन (NOAA), क्लाइमेट प्रेडिक्शन सेंटर (CPC), इंटरनेशनल रिसर्च इंस्टीट्यूट फॉर क्लाइमेट एंड सोसाइटी (IRI), ऑस्ट्रेलियाई मौसम विज्ञान ब्यूरो (Australian Bureau of Meteorology), जापान मौसम विज्ञान एजेंसी (Japan Meteorological Agency) और ब्रिटेन का मौसम कार्यालय (UK Met Office) लगातार प्रशांत महासागर के तापमान की निगरानी कर रही हैं।

वर्तमान मॉडल संकेत दे रहे हैं कि आने वाले महीनों में अल नीनो तेजी से विकसित हो सकता है। जून से जुलाई के बीच इसके आधिकारिक रूप से अल नीनो श्रेणी में प्रवेश करने की संभावना है। सबसे जरूरी बात यह है कि कई अंतरराष्ट्रीय मॉडल मानसून सीजन के दौरान अल नीनो बने रहने की 95 प्रतिशत या उससे अधिक संभावना दिखा रहे हैं। यह आंकड़ा असाधारण रूप से ऊंचा माना जा रहा है। हालांकि अभी यह तय नहीं है कि इसकी तीव्रता कितनी होगी और इसका चरम (Peak) कब आएगा। यही सबसे बड़ा अनिश्चित कारक बना हुआ है।

भारत में अल नीनो और मानसून का रिकॉर्ड

अल नीनो और भारतीय मानसून के बीच लंबे समय से संबंध देखा गया है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा नहीं पड़ा, लेकिन कई बार मानसून सामान्य से कमजोर रहा है। 1982-83 का अल नीनो अब तक के सबसे शक्तिशाली अल नीनो घटनाक्रमों में गिना जाता है। उस दौरान समुद्री सतह का तापमान सामान्य से लगभग 2.5 डिग्री सेल्सियस तक अधिक दर्ज किया गया था। 1987, 2002, 2009 और 2015 जैसे वर्षों में भी अल नीनो के साथ मानसून पर प्रतिकूल प्रभाव देखने को मिला।

फिर भी यह ध्यान रखना जरूरी है कि अल नीनो और मानसून का संबंध पूर्ण रूप से रैखिक नहीं है। कुछ वर्षों में मजबूत अल नीनो के बावजूद मानसून बेहतर रहा है। इसलिए केवल अल नीनो के आधार पर पूरे मानसून का आंकलन करना उचित नहीं होगा।

क्या 1982-83 का रिकॉर्ड टूट सकता है?

कुछ वैश्विक मॉडल संकेत दे रहे हैं कि इस बार बढ़ता समुद्री तापमान 1982-83 के रिकॉर्ड को चुनौती दे सकत है। यही कारण है कि सुपर अल नीनो को लेकर चर्चा बढ़ रही है। हालांकि वैज्ञानिकों का मानना है कि अभी इस बारे में निश्चित निष्कर्ष निकालना जल्दबाजी होगी। मौजूदा समय में केवल संभावनाएं दिखाई दे रही हैं। आने वाले महीनों के आंकड़े यह तय करेंगे कि यह अल नीनो कितना मजबूत बनेगा और क्या वास्तव में यह रिकॉर्ड स्तर तक पहुंच पाएगा।

क्या पूरे भारत में मानसून खराब होगा?

यह सबसे जरूरी सवाल है और इसका जवाब "जरूरी नहीं" है। इतिहास बताता है कि सबसे मजबूत अल नीनो वर्षों में भी भारत के कुछ हिस्सों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा हुई है।पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी राजस्थान, सौराष्ट्र क्षेत्र और कुछ मामलों में कर्नाटक जैसे क्षेत्रों में मजबूत अल नीनो के दौरान भी अच्छी वर्षा दर्ज की गई थी। इसका अर्थ है कि अल नीनो पूरे देश में समान प्रभाव नहीं डालता। कुछ क्षेत्रों में वर्षा की कमी हो सकती है, जबकि अन्य क्षेत्रों में सामान्य या अधिक बारिश भी संभव है।

किन राज्यों पर ज्यादा असर और किन क्षेत्रों को मिल सकती है राहत?

पिछले सुपर अल नीनो वर्षों के अध्ययन से संकेत मिलता है कि पश्चिमी राजस्थान, पूर्वी राजस्थान, सौराष्ट्र, गुजरात के कुछ हिस्से और कर्नाटक के कुछ क्षेत्रों में मानसून बेहतर रह सकता है। वहीं मध्य भारत के कुछ हिस्सों, वर्षा आधारित कृषि क्षेत्रों और मानसून कोर जोन में वर्षा की कमी का जोखिम बढ़ सकता है। हालांकि यह केवल संभावित संकेत हैं और वास्तविक तस्वीर मानसून की प्रगति तथा अन्य वैश्विक मौसमीय कारकों पर निर्भर करेगी। सबसे बड़ी चुनौती यही है कि मानसून शुरू होने से पहले सटीक रूप से यह बताना कठिन होता है कि कौन-सा क्षेत्र अधिक प्रभावित होगा और कौन-सा क्षेत्र बेहतर प्रदर्शन करेगा।

मानसून की शुरुआत पर क्या असर पड़ सकता है?

अल नीनो का पहला प्रभाव मानसून की शुरुआत और उसकी प्रगति पर दिखाई दे सकता है।संकेत मिल रहे हैं कि केरल में मानसून का आगमन तो हो गया है, लेकिन इसकी प्रगति सामान्य गति से धीमी रह सकती है। तटीय कर्नाटक और गोवा तक अच्छी बारिश हो सकती है, लेकिन आंतरिक हिस्सों में मानसून की रफ्तार कमजोर पड़ने के आसार हैं। सामान्य परिस्थितियों में मानसून 8 जुलाई तक पूरे देश को कवर कर लेता है, लेकिन इस बार इसकी प्रगति में रुकावट या देरी की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

किसानों के लिए क्या संकेत हैं?

भारत की कृषि काफी हद तक मानसूनी वर्षा पर निर्भर करती है। इसलिए अल नीनो की स्थिति किसानों के लिए विशेष महत्व रखती है। विशेषज्ञों का मानना है कि किसानों को फिलहाल घबराने की जरूरत नहीं है, लेकिन सतर्क रहना जरूरी है। बुवाई से जुड़े निर्णय स्थानीय मौसम पूर्वानुमानों को ध्यान में रखकर लेने चाहिए। जल संरक्षण, फसल विविधीकरण और जोखिम प्रबंधन जैसी रणनीतियां भी उपयोगी साबित हो सकती हैं। मौसम से जुड़े अपडेट पर नियमित नजर रखना इस बार पहले से अधिक जरूरी होगा।

सुपर अल नीनो को लेकर अभी सबसे बड़ा सवाल क्या है?

मौसम वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा प्रश्न यह नहीं है कि अल नीनो बनेगा या नहीं, बल्कि यह है कि इसकी चरम तीव्रता कब आएगी और यह कितना मजबूत होगा। वर्तमान मॉडल संकेत देते हैं कि अल नीनो जून-जुलाई से मजबूत होना शुरू कर सकता है और अगस्त से अक्टूबर के दौरान इसकी तीव्रता सबसे अधिक हो सकती है। हालांकि मौसम मॉडल समय-समय पर बदलते रहते हैं और नई जानकारी आने के साथ पूर्वानुमानों में संशोधन भी संभव है। यही वजह है कि वैज्ञानिक लगातार प्रशांत महासागर के तापमान और अन्य वैश्विक मौसमीय संकेतकों की निगरानी कर रहे हैं।

मानसून पर कैसा असर?

सुपर अल नीनो की संभावना निश्चित रूप से चिंता का विषय है, क्योंकि इसका भारत के मानसून पर ऐतिहासिक रूप से नकारात्मक प्रभाव रहा है। लेकिन अभी यह कहना जल्दबाजी होगी कि इस वर्ष मानसून कमजोर ही रहेगा। मानसून पर केवल अल नीनो ही असर नहीं डालता। हिंद महासागर द्विध्रुव (IOD), मैडेन-जूलियन ऑस्सीलेशन (MJO), पश्चिमी विक्षोभ और अन्य वैश्विक मौसमीय कारक भी भूमिका निभाते हैं। फिलहाल सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अल नीनो के विकास और उसकी तीव्रता पर लगातार नजर रखी जाए। आने वाले कुछ सप्ताह मानसून और अल नीनो दोनों की दिशा तय करने में निर्णायक साबित होंगे। सुपर अल नीनो का खतरा जरूर है, लेकिन अभी यह मान लेना कि पूरा मानसून खराब हो जाएगा, उचित नहीं होगा। सतर्कता जरूरी है, लेकिन घबराने की नहीं।

author image
Mohini Sharma
Content Writer
Mohini Sharma is a Content Writer at Skymet Weather Services with nearly five years of experience in journalism. At Skymet, she brings clarity and creativity to weather communication, crafting engaging news stories and updates that simplify complex weather patterns and forecasts. With her precise and relatable writing style, she helps audiences stay informed and connected to the ever-changing world of weather.
FAQ

सुपर अल नीनो कोई आधिकारिक वैज्ञानिक शब्द नहीं है। आमतौर पर बहुत मजबूत (Very Strong) अल नीनो को सुपर अल नीनो कहा जाता है, जब प्रशांत महासागर का तापमान सामान्य से काफी अधिक बढ़ जाता है।

संभावना रहती है, क्योंकि ऐतिहासिक रूप से कई अल नीनो वर्षों में मानसून कमजोर रहा है। हालांकि हर अल नीनो वर्ष में सूखा पड़े, ऐसा जरूरी नहीं है।

नहीं। कई बार मजबूत अल नीनो के दौरान भी कुछ क्षेत्रों में सामान्य या सामान्य से अधिक वर्षा दर्ज की गई है।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी स्काइमेट की पूर्वानुमान टीम द्वारा किए गए मौसम और जलवायु विश्लेषण पर आधारित है। हम वैज्ञानिक रूप से सही जानकारी देने का प्रयास करते हैं, लेकिन बदलती वायुमंडलीय स्थितियों के कारण मौसम में बदलाव संभव है। यह केवल सूचना के लिए है, इसे पूरी तरह निश्चित भविष्यवाणी न मानें।

Skymet भारत की सबसे बेहतर और सटीक निजी मौसम पूर्वानुमान और जलवायु इंटेलिजेंस कंपनी है, जो देशभर में विश्वसनीय मौसम डेटा, मानसून अपडेट और कृषि जोखिम प्रबंधन समाधान प्रदान करती है