India Monsoon Criteria: आखिर कैसे तय होता है भारतीय उपमहाद्वीप में मानसून का आगमन?
मुख्य मौसम बिंदु
- मानसून 16 मई को अंडमान-निकोबार पहुंचा
- केरल पहुंचने में अभी लगभग 10 दिन लग सकते हैं
- मानसून आगमन के लिए बारिश, हवाएं और OLR मानक जरूरी
- बंगाल की खाड़ी और अरब सागर शाखाओं की भूमिका अहम
दक्षिण-पश्चिम मानसून इस बार सामान्य समय से पहले अंडमान सागर पहुंच गया है। मानसून ने 16 मई 2026 को दक्षिण अंडमान सागर और अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में प्रवेश किया, जो सामान्य तिथि से लगभग एक सप्ताह पहले है। इसके बाद मानसून ने दक्षिण और दक्षिण-पूर्व बंगाल की खाड़ी तथा उत्तर अंडमान सागर के कुछ और हिस्सों में भी आगे बढ़त बना ली है। हालांकि अब भी मानसून को केरल पहुंचने में लगभग 10 दिन का समय लग सकता है। मौसम विशेषज्ञों के अनुसार मानसून हमेशा तय समयसीमा का पालन नहीं करता। अंडमान सागर में जल्दी पहुंचने का मतलब यह नहीं होता कि केरल में भी मानसून जल्दी पहुंचेगा। इसके अलावा मानसून के आगमन की तारीख का पूरे देश में मानसून के प्रदर्शन से सीधा संबंध नहीं होता।
केरल में मानसून आने के लिए क्या हैं नियम?
अंडमान और निकोबार द्वीप समूह के लिए मानसून आगमन के कोई सख्त मानक तय नहीं हैं, लेकिन केरल में मानसून की आधिकारिक एंट्री के लिए कुछ तय नियमों का पालन जरूरी होता है। केरल में मानसून आने की घोषणा 10 मई से पहले नहीं की जाती। इसके बाद यदि उपलब्ध 14 मौसम स्टेशनों में से कम से कम 60 प्रतिशत स्टेशनों पर लगातार दो दिनों तक 2.5 मिमी या उससे अधिक बारिश दर्ज हो, तब दूसरे दिन मानसून आगमन घोषित किया जाता है। इन स्टेशनों में मिनिकॉय, अमिनी देवी, तिरुवनंतपुरम, पुनलूर, कोल्लम, अलाप्पुझा, कोट्टायम, कोच्चि, त्रिशूर, कोझिकोड, थालास्सेरी, कन्नूर, कुडुलु और मंगलूरु शामिल हैं।
मानसून आगमन के लिए हवाओं की भूमिका
केरल में मानसून आगमन के दौरान अरब सागर की ओर से आने वाली पश्चिमी हवाओं का मजबूत होना जरूरी माना जाता है। इसके लिए भूमध्य रेखा से 10 डिग्री उत्तर अक्षांश और 55 से 80 डिग्री पूर्व देशांतर के बीच लगभग 12 हजार फीट ऊंचाई तक पश्चिमी हवाओं का प्रभाव बना रहना चाहिए। इसके अलावा 5 से 10 डिग्री उत्तर अक्षांश और 70 से 80 डिग्री पूर्व देशांतर के बीच लगभग 3000 फीट की ऊंचाई पर हवाओं की गति 15 से 20 नॉट्स होनी चाहिए।
OLR वैल्यू भी तय करती है मानसून की एंट्री
मानसून आगमन के लिए आउटगोइंग लॉन्ग वेव रेडिएशन यानी OLR वैल्यू भी अहम भूमिका निभाती है। 5 से 10 डिग्री उत्तर अक्षांश और 70 से 75 डिग्री पूर्व देशांतर के बीच OLR वैल्यू 200 W/m² से कम होनी चाहिए। कम OLR वैल्यू का मतलब होता है कि बादल सक्रिय हैं और बारिश की संभावना मजबूत है।
अरब सागर और बंगाल की खाड़ी की शाखाओं में अंतर
केरल में मानसून का आगमन मुख्य रूप से अरब सागर शाखा के मजबूत होने पर निर्भर करता है। वहीं अंडमान सागर में मानसून की शुरुआत बंगाल की खाड़ी शाखा के प्रभाव में होती है। अरब सागर शाखा को मजबूत होकर केरल तक पहुंचने में बंगाल की खाड़ी शाखा की तुलना में अधिक मेहनत करनी पड़ती है। आमतौर पर बंगाल की खाड़ी में बनने वाला निम्न दबाव क्षेत्र मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करता है। इससे दक्षिण-पूर्व अरब सागर और लक्षद्वीप क्षेत्र में मानसूनी हवाएं तेज हो जाती हैं, जिसके कारण केरल और तटीय कर्नाटक में बारिश शुरू होती है। इसके अलावा लक्षद्वीप क्षेत्र में बनने वाला भंवर यानी वॉर्टेक्स भी भूमध्यरेखीय हवाओं को तेज कर मानसून को गति दे सकता है। कभी-कभी केरल और तटीय कर्नाटक के पास बनने वाली ऑफशोर ट्रफ भी मानसून को आगे बढ़ाने में मदद करती है।
इस बार मानसून का मुख्य ट्रिगर क्या होगा?
इस सीजन में मानसून को आगे बढ़ाने वाला मुख्य मौसम सिस्टम कौन होगा, इस बारे में अभी कुछ साफ कहना जल्दबाजी होगी। केरल में मानसून पहुंचने की सामान्य तारीख 1 जून मानी जाती है और इसमें लगभग 7 दिनों का अंतर सामान्य माना जाता है। इसके अलावा केरल में मानसून कब पहुंचा, इसका असर देश के बाकी हिस्सों में मानसून के आगे बढ़ने की गति पर जरूरी नहीं पड़ता। पूरे देश में मानसून के फैलने की सामान्य तारीख 8 जुलाई मानी जाती है।
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