प्रशांत महासागर से भारत के खेतों तक, अल नीनो 2026 से भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना खतरा?

By: Arti Kumari | Edited By: Mohini Sharma
Jul 3, 2026, 10:00 AM
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भारत की अर्थव्यवस्था पर अल-नीनो का असर

मुख्य मौसम बिंदु

  • प्रशांत महासागर में अल नीनो की स्थिति तेजी से विकसित हो रही है।
  • कमजोर मानसून का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों और किसानों की आय पर पड़ सकता है।
  • खाद्य उत्पादन घटने से महंगाई और RBI की चुनौतियां बढ़ सकती हैं।
  • शहरों में अल नीनो और अर्बन हीट आइलैंड प्रभाव मिलकर गर्मी को और बढ़ा सकते हैं।
  • पूर्वानुमान वैधता: यह आकलन जून 2026 के मौसमीय संकेतकों पर आधारित है और नवंबर 2026–जनवरी 2027 तक की संभावित अल नीनो स्थिति को कवर करता है।

प्रशांत महासागर से भारत के खेतों तक: अल-नीनो 2026 से भारतीय अर्थव्यवस्था को कितना खतरा?

हर कुछ वर्षों में प्रशांत महासागर का मौसम सामान्य से अलग हो जाता है। हवाएं कमजोर पड़ जाती हैं, पश्चिमी प्रशांत में जमा गर्म पानी पूर्व की ओर खिसकने लगता है, समुद्र की सतह का तापमान बढ़ जाता है और वातावरण की संरचना बदल जाती है। इसका असर हजारों किलोमीटर दूर भारत तक पहुंचता है, जहां दक्षिण-पश्चिम मानसून कमजोर पड़ने लगता है। इसी घटना को अल-नीनो (El Niño) कहा जाता है। बता दें, मौसम की इस स्थिति को यह नाम पेरू के मछुआरों ने दिया था, जिन्होंने क्रिसमस के आसपास समुद्र के असामान्य रूप से गर्म होने को देखा था। वर्ष 2026 में अल नीनो केवल एक संभावना नहीं बल्कि एक वास्तविक खतरे के रूप में उभर रहा है। भूमध्यरेखीय प्रशांत महासागर में इसके संकेत विकसित हो चुके हैं और इसके वर्ष 2026 के अंत तक और मजबूत होने की संभावना है।

अल-नीनो 2026 कैसे विकसित हुआ?

स्काईमेट की मौसम विज्ञान टीम वर्ष 2026 की शुरुआत से ही ENSO (अल नीनो-दक्षिणी दोलन) की गतिविधियों पर नजर रख रही है। गौरतलब है, मई 2026 के मध्य तक प्रशांत महासागर में सामान्य (ENSO-न्यूट्रल) स्थिति तेजी से बदलने लगी थी। अप्रैल के आखिर से ही महासागर के अधिकांश हिस्सों का पानी सामान्य से अधिक गर्म बना हुआ था। अप्रैल 2026 अब तक के सबसे गर्म अप्रैलों में से एक रहा। उस समय नीनो 3.4 क्षेत्र का तापमान सामान्य से 0.4°C अधिक था। यह अल नीनो घोषित होने की सीमा से थोड़ा कम था, लेकिन लगातार उसी दिशा में बढ़ रहा था। सबसे ज्यादा चिंता नीनो 1+2 क्षेत्र को लेकर थी, जहां समुद्र का तापमान सामान्य से 1.6°C अधिक दर्ज किया गया। इसी वजह से स्काईमेट ने संभावना जताई थी कि अगर यही स्थिति बनी रही, तो इस बार बहुत शक्तिशाली यानी "सुपर एल नीनो" विकसित हो सकता है। अब तक के इतिहास में 1982-83, 1997-98 और 2015-16 जैसे कुछ ही साल ऐसे रहे हैं, जब बेहद शक्तिशाली अल-नीनो देखने को मिला था।

मई 2026 के अंत तक क्या हुआ?

30 मई तक प्रशांत महासागर में अल-नीनो जैसी परिस्थितियां लगभग पूरी तरह विकसित हो चुकी थीं। IRI ENSO पूर्वानुमान ने मई-जुलाई 2026 के दौरान अल-नीनो की संभावना 98% बताई, जो इस सदी में बहुत ही दुर्लभ मानी जाती है। समुद्र के भीतर का तापमान लगातार छह महीनों से बढ़ रहा था। स्काईमेट के अनुसार ऐसी भीषण गर्मी भारतीय मानसून को प्रभावित कर सकती है, हालांकि इसका अंतिम असर अन्य मौसमीय कारकों पर भी निर्भर करेगा। अल-नीनो का प्रभाव तेजी से बढ़ सकता है और मानसून पर प्रतिकूल असर की संभावना भी बढ़ रही है।

जून 2026 की शुरुआत में क्या स्थिति बनी?

6 जून तक नीनो 3.4 इंडेक्स में मामूली वृद्धि हुई, लेकिन पेरू तट के पास नीनो 1+2 क्षेत्र का तापमान दिसंबर 2023 के बाद सबसे अधिक 1.7°C तक पहुंच गया। इस बीच भारतीय महासागर द्विध्रुव (IOD) -0.43°C पर पहुंच गया, जो नकारात्मक स्थिति की ओर संकेत करता है। सामान्यतः सकारात्मक IOD अल-नीनो के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकता है, लेकिन फिलहाल ऐसा नहीं दिख रहा। मैडेन-जूलियन ऑसिलेशन (MJO) भी फेज-8 में पहुंच गया, जो मानसून की प्रगति के लिए विशेष रूप से अनुकूल नहीं माना जाता। हालांकि मानसून केरल पहुंच चुका है, लेकिन नकारात्मक IOD और कमजोर MJO इसकी रफ्तार को प्रभावित कर सकते हैं। स्काईमेट लगातार यह स्पष्ट करता रहा है कि केवल अल-नीनो ही मानसून का भविष्य तय नहीं करता। हिमालयी बर्फ, IOD, MJO और अन्य मौसमी कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। NOAA के 11 जून 2026 के अपडेट के अनुसार नवंबर से जनवरी के दौरान बहुत शक्तिशाली अल-नीनो बनने की संभावना 63% है। हालांकि मानसून के महीनों में इसके कमजोर से मध्यम स्तर के बने रहने की संभावना अधिक है। सितंबर-अक्टूबर में इसके मजबूत होने की लगभग 40% संभावना है।

"सुपर अल-नीनो" और "गॉडज़िला अल-नीनो" कितने सही शब्द हैं?

हाल के वर्षों में मीडिया ने "सुपर अल-नीनो" और "गॉडज़िला अल-नीनो" जैसे शब्दों का उपयोग बढ़ा दिया है। यह नाम 2015-16 के अत्यंत शक्तिशाली अल-नीनो के दौरान लोकप्रिय हुए थे। लेकिन स्काईमेट इन शब्दों का समर्थन नहीं करता है। मौसम विज्ञान एक वैज्ञानिक विषय है और किसी जटिल महासागरीय-वायुमंडलीय घटना को सनसनीखेज नामों से समझना उचित नहीं है।

1876-78 का भीषण अकाल और अल-नीनो

भारत का 1876-78 का महान अकाल अक्सर अल-नीनो से जोड़ा जाता है। इस दौरान लगभग 55 लाख से 82 लाख लोगों की मौत हुई थी। लेकिन उस समय प्रशांत महासागर के तापमान को मापने की कोई व्यवस्था नहीं थी। इसलिए अल-नीनो से इसका संबंध बाद में शोध और ऐतिहासिक आंकड़ों के आधार पर जोड़ा गया। यह घटना इस बात का उदाहरण जरूर है कि कमजोर मानसून और प्रशासनिक तैयारियों की कमी मिलकर कितनी बड़ी त्रासदी पैदा कर सकती है।

भारत की अर्थव्यवस्था पर अल-नीनो का असर

ज्यादा गर्मी और कम पानी से कृषि सबसे पहले प्रभावित होती है, अल-नीनो का सबसे बड़ा असर खरीफ फसलों पर पड़ता है। धान, कपास, सोयाबीन और दालों जैसी फसलें जून से अक्टूबर के बीच बोई जाती हैं और मानसून पर निर्भर रहती हैं। अगर बारिश कम हो जाए या देर से आए तो बुवाई प्रभावित होती है, मिट्टी में नमी घटती है और उत्पादन कम हो जाता है। किसानों को भूजल निकालने के लिए अधिक डीजल और बिजली खर्च करनी पड़ती है। इससे लागत बढ़ती है और मुनाफा घट जाता है। 2015-16 के अल-नीनो वर्ष में भारत की कृषि विकास दर केवल 0.5% रह गई थी।

खाद्य महंगाई का खतरा-कम उत्पादन का सीधा असर खाद्य पदार्थों की कीमतों पर पड़ता है। जब अनाज, दालें और सब्जियां कम उपलब्ध होती हैं तो उनकी कीमतें बढ़ जाती हैं। इसे कृषि महंगाई या एग्रीफ्लेशन कहा जाता है। भारत के उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) में खाद्य पदार्थों का बड़ा हिस्सा है। इसलिए खाद्य महंगाई आम लोगों की क्रय शक्ति को तेजी से प्रभावित करती है।

RBI के लिए चुनौती-महंगाई बढ़ने पर भारतीय रिजर्व बैंक को ब्याज दरें बढ़ानी पड़ सकती हैं। लेकिन ऊंची ब्याज दरें आर्थिक विकास को धीमा कर देती हैं। उद्योगों का निवेश घटता है, कर्ज महंगा होता है और विकास दर प्रभावित होती है। अनुमान है कि वित्त वर्ष 2026-27 में भारत की GDP वृद्धि दर घटकर लगभग 6.5% रह सकती है।

ऊर्जा और जल संकट-सूखे की स्थिति में जलाशयों का जल स्तर घट जाता है, जिससे जलविद्युत उत्पादन कम होता है। ऐसे समय में बिजली की मांग बढ़ने के कारण कोयले के आयात की जरूरत पड़ सकती है। SBI रिसर्च के अनुसार एक गंभीर अल-नीनो भारत को 20 से 25 अरब डॉलर तक का आर्थिक नुकसान पहुंचा सकता है।

शहरों में बढ़ती गर्मी और अल-नीनो

अल-नीनो का असर केवल गांवों तक सीमित नहीं रहता। शहरों में कंक्रीट, डामर और ऊंची इमारतों के कारण "अर्बन हीट आइलैंड" प्रभाव पैदा होता है, जिससे शहर आसपास के ग्रामीण क्षेत्रों की तुलना में अधिक गर्म हो जाते हैं। जब अल-नीनो तापमान बढ़ाता है तो यह प्रभाव और गंभीर हो जाता है। सबसे ज्यादा असर निर्माण मजदूरों, रेहड़ी-पटरी विक्रेताओं और बाहर काम करने वाले श्रमिकों पर पड़ता है। ILO के अनुसार वैश्विक तापमान में 1.5°C वृद्धि से 2030 तक दुनिया भर में 8 करोड़ पूर्णकालिक नौकरियों के बराबर कार्य घंटे समाप्त हो सकते हैं।

अल-नीनो के खतरे से कैसे निपटें?

कृषि को अधिक मजबूत बनाना होगा। पानी अधिक मांगने वाली फसलों की जगह मोटे अनाज, दलहन और तिलहन जैसी सूखा-रोधी फसलों को बढ़ावा देना होगा। ड्रिप और स्प्रिंकलर सिंचाई जैसी तकनीकों का तेजी से विस्तार करना जरूरी है। वहीं, जल संरक्षण और शहरी ढांचे में सुधार की भी जरूरत है। इसके लिए तालाबों, झीलों और पारंपरिक जल स्रोतों का पुनर्जीवन करना होगा। शहरों में हरित क्षेत्र बढ़ाने, वेटलैंड बचाने और कूल रूफ जैसी योजनाओं को प्राथमिकता देनी होगी। साथ ही हीट एक्शन प्लान को प्रभावी ढंग से लागू करना होगा। किसानों तक स्थानीय भाषाओं में समय पर मौसम संबंधी चेतावनी और सलाह पहुंचाना जरूरी होगा।

निष्कर्ष: पूर्वानुमान खतरा है, लेकिन नियति नहीं

अल-नीनो 2026 वास्तविक है, मजबूत हो रहा है और इसके प्रभाव गंभीर हो सकते हैं। यह मानसून को कमजोर कर सकता है। जिससे कृषि उत्पादन घटा सकता है, खाद्य महंगाई बढ़ा सकती है, ऊर्जा संकट उभर सकता है और शहरों में गर्मी बढ़ जाएगी। लेकिन भारत आज 1876 वाला भारत नहीं है। अब हमारे पास बेहतर मौसम पूर्वानुमान, राहत योजनाएं, भंडार और संस्थागत व्यवस्थाएं मौजूद हैं। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अब हमें पता है कि खतरे से कैसे निपटना है। इसलिए असली सवाल अल-नीनो का नाम नहीं, बल्कि उसके प्रति हमारी तैयारी और प्रतिक्रिया की गति है।

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Arti Kumari
Content Writer (English)
With a strong foundation in science and a passion for research, Arti specializes in weather and climate communication. At Skymet Weather, she leads the company's digital content strategy, transforming complex meteorological data into clear, engaging narratives. Her research-backed storytelling has helped expand Skymet's digital reach while making weather and climate information accessible to millions of readers across India and beyond.
FAQ

अल नीनो मानसून की बारिश को प्रभावित कर सकता है, जिससे कृषि उत्पादन, खाद्य कीमतें और आर्थिक विकास पर असर पड़ सकता है।

नहीं, अल नीनो मानसून को कमजोर कर सकता है, लेकिन IOD, MJO और अन्य मौसमीय कारक भी अंतिम परिणाम तय करते हैं।

खाद्य महंगाई बढ़ सकती है, बिजली और पानी की मांग बढ़ सकती है तथा गर्मी का प्रभाव अधिक महसूस हो सकता है।

डिस्क्लेमर: यह जानकारी स्काइमेट की पूर्वानुमान टीम द्वारा किए गए मौसम और जलवायु विश्लेषण पर आधारित है। हम वैज्ञानिक रूप से सही जानकारी देने का प्रयास करते हैं, लेकिन बदलती वायुमंडलीय स्थितियों के कारण मौसम में बदलाव संभव है। यह केवल सूचना के लिए है, इसे पूरी तरह निश्चित भविष्यवाणी न मानें।

Skymet भारत की सबसे बेहतर और सटीक निजी मौसम पूर्वानुमान और जलवायु इंटेलिजेंस कंपनी है, जो देशभर में विश्वसनीय मौसम डेटा, मानसून अपडेट और कृषि जोखिम प्रबंधन समाधान प्रदान करती है